संवाददाता- वीरेंद्र कुमार, नालंदा
Nalanda: बिहार सरकार द्वारा स्वच्छता अभियान के तहत हर घर शौचालय और बहू-बेटी सुरक्षित, स्वच्छ बिहार जैसे नारों के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में जमीनी हालात पूरी तरह इसके विपरीत हैं. नालंदा जिले के अस्थावां प्रखंड के सारे पंचायत के भैरविघा गांव वार्ड संख्या-6 में बना सामूहिक महादलित शौचालय इन सरकारी दावों की पोल खोल रहा है.
स्थानीय ग्रामीणों ने कहा कि लगभग चार से पांच वर्ष पूर्व दो लाख रुपये की लागत से इस सामूहिक शौचालय का निर्माण कराया गया था. लेकिन निर्माण के बाद वर्षों तक इसमें ताला लगा रहा. तीन महीने पहले जब शौचालय का ताला खोला गया तो अंदर का दृश्य देखकर ग्रामीण दंग रह गए. शौचालय के भीतर गंदगी का अंबार था और बदबू इतनी तीव्र थी कि वहां खड़ा रहना भी मुश्किल हो गया.

शौचालय होते हुए भी महिलाएं खेत जाने को मजबूर
स्थानीय गांव की शोभा देवी, चिंता देवी समेत अन्य महिलाओं ने बताया कि शौचालय होने के बावजूद जबरन खेतों की राह पकड़नी पड़ती है. शौचालय का उपयोग करना तो दूर, उसके पास खड़ा होना भी दूभर हो गया है. सरकार ने शौचालय तो बनवा दिया, पर उसकी सफाई और रखरखाव की कोई व्यवस्था नहीं है, ग्रामीणों का साफ कहना है.
मुखिया बोले- सफाई की जिम्मेदारी उपयोगकर्ताओं की
इस संबंध में सारे पंचायत के मुखिया प्रतिनिधि जितेंद्र सिंह ने बताया कि भैरविघा वार्ड संख्या-6 में सामूहिक शौचालय का निर्माण करीब 2 लाख रुपये की राशि से कराया गया था. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि शौचालय की सफाई की जिम्मेदारी ग्रामीणों की ही है. सरकार की ओर से न तो कोई विशेष फंड मिलता है, न कोई सफाईकर्मी की व्यवस्था की जाती है.

सरकारी योजनाएं कागज़ पर सफल, जमीनी स्तर पर फेल
भले ही आंकड़ों में बिहार खुले में शौच मुक्त राज्य घोषित कर दिया गया हो, लेकिन गांवों की हकीकत इससे अलग है. भैरविघा जैसे सैकड़ों गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं. सवाल यह है कि क्या सिर्फ शौचालय बना देना ही सरकार की जिम्मेदारी खत्म कर देता है?
जब तक इनके रखरखाव और सफाई के लिए स्थायी व्यवस्था नहीं होगी, तब तक बहू-बेटियों की सुरक्षा और सम्मान की बात महज एक चुनावी नारा बनकर रह जाएगी.






