- वरिष्ठ पत्रकार की कलम से
Patna: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियों में चिराग पासवान अपनी “बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट” रणनीति के साथ पूरी तरह सक्रिय हैं. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान ने हाल ही में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान से मुलाकात कर स्व. रामविलास पासवान की जयंती समारोह का निमंत्रण दिया. इस दौरान उन्होंने दावा किया कि अगर 2020 के विधानसभा चुनाव में वह एनडीए के साथ होते, तो राजद (RJD) दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाता. यह बयान उनकी सियासी ताकत और एनडीए में बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है.
चिराग पासवान का वोट बैंक और सियासी ताकत
चिराग पासवान बिहार में दलित, खासकर दुसाध (पासवान) समुदाय के बीच मजबूत पकड़ रखते हैं. 2023 की जातिगत जनगणना के अनुसार, दुसाध समुदाय बिहार की 5.31% आबादी का हिस्सा है, जबकि कुल दलित आबादी 19.65% है. चिराग का प्रभाव इस वोट बैंक को एनडीए की ओर खींच सकता है. 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने पांच सीटों पर 100% जीत हासिल की, जिससे उनकी विश्वसनीयता बढ़ी है. इस आधार पर चिराग 40-50 विधानसभा सीटों की मांग कर रहे हैं, और चर्चा है कि उनकी पार्टी को 25-28 सीटें मिल सकती हैं, जो छोटे सहयोगियों में सबसे ज्यादा है. उनकी सक्रियता, विशेष रूप से शहाबाद जैसे गैर-पारंपरिक एनडीए क्षेत्रों में, गठबंधन को नए क्षेत्रों में विस्तार देने में मददगार हो सकती है. यदि चिराग दलित वोटों को एकजुट कर पाते हैं, तो वह 2025 में एनडीए के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं.

जेडीयू और मांझी के साथ तनाव
हालांकि एनडीए में सतह पर सब कुछ ठीक दिखता है, लेकिन चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच तनाव स्पष्ट है. मांझी, जो हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) के प्रमुख हैं और मुसहर समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं, ने चिराग की बढ़ती महत्वाकांक्षा पर असहजता जताई है. मांझी ने बीजेपी से चिराग पर “लगाम” लगाने की मांग की और 2020 में उनकी जेडीयू के खिलाफ बगावत को गठबंधन के लिए नुकसानदायक बताया. मांझी ने चिराग की रैलियों में भीड़ को “दबाव की रणनीति” करार दिया और उनकी सियासी समझदारी पर सवाल उठाए. 2020 में रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद मांझी द्वारा उनकी मौत की जांच की मांग ने दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत तनाव को और बढ़ाया.
जेडीयू के साथ भी चिराग का रिश्ता सहज नहीं है. 2020 में चिराग ने जेडीयू के खिलाफ 137 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर नीतीश कुमार की पार्टी को नुकसान पहुंचाया था, जिसे जेडीयू के नेता भूले नहीं हैं. चिराग की 40-50 सीटों की मांग मांझी की 20 सीटों की मांग के साथ टकरा रही है, क्योंकि दोनों दलित वोटों, खासकर दुसाध और मुसहर समुदायों, पर दावेदारी करते हैं. यह ओवरलैप गठबंधन में आंतरिक संघर्ष को बढ़ा सकता है.

नालंदा और शाहाबाद में चिराग का सियासी संदेश
चिराग ने हाल ही में नालंदा में “बहुजन भीम संकल्प समागम” और शाहाबाद में सभाएं कर जेडीयू और मांझी को स्पष्ट संदेश दिया है. नालंदा में उन्होंने कहा, “कई लोग मेरे बिहार आने से घबराए हुए हैं. वे जानना चाहते हैं कि क्या मैं विधानसभा चुनाव लड़ूंगा. मैं साफ कहता हूं कि मैं बिहार के लिए चुनाव लड़ूंगा. ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ मेरा सपना है और इसे साकार करना है. मेरे रास्ते में बाधाएं खड़ी की जा रही हैं, लेकिन मैं निराश नहीं होऊंगा.” उन्होंने कार्यकर्ताओं से सभी 243 विधानसभा क्षेत्रों में एनडीए की जीत के लिए जुटने को कहा.
शाहाबाद में उनकी सभा भी रणनीतिक थी, जहां महादलित और पासवान वोटर कई सीटों पर निर्णायक हैं. इस क्षेत्र में नीतीश कुमार और मांझी की भी पकड़ है, लेकिन चिराग की सक्रियता से गठबंधन के भीतर तनाव बढ़ सकता है.
चिराग पासवान 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए के लिए तुरुप का इक्का बन सकते हैं, बशर्ते वह दलित वोटों को एकजुट कर पाएं और सीट बंटवारे में उनकी मांगें संतुलित हों. उनकी 2024 की लोकसभा जीत और दलित वोटों पर पकड़ गठबंधन को मजबूती दे सकती है. हालांकि, जेडीयू और मांझी के साथ तनाव और सीट बंटवारे का विवाद उनकी राह में चुनौती बन सकता है. अगर एनडीए इन आंतरिक तनावों को सुलझा लेता है, तो चिराग की सक्रियता सत्ता की राह को आसान कर सकती है.
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