बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण पर राजनीति गर्म, विपक्ष ने लगाया बैक डोर एनआरसी का आरोप

By: Hemlata Karn

On: Monday, June 30, 2025 10:42 AM

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  • वरिष्ठ पत्रकार के कलम से

Patna: बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण पर राजनीति गर्म है. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष अभियान को लेकर सियासी घमासान छिड़ गया है. विपक्षी दलों ने इसे ‘बैक डोर एनआरसी’ करार देते हुए कड़ा विरोध जताया है. चुनाव आयोग के इस अभियान के तहत 8 करोड़ से अधिक मतदाताओं की पात्रता का सत्यापन किया जा रहा है, जिसे विपक्ष ने अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों को मताधिकार से वंचित करने की साजिश बताया है.

विशेष गहन पुनरीक्षण: क्या है मामला?

चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का आदेश जारी किया, जिसका कार्य 25 जून से शुरू हो चुका है. इस अभियान के तहत बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) घर-घर जाकर मतदाताओं की जानकारी सत्यापित कर रहे हैं. 30 सितंबर 2025 को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी. आयोग का कहना है कि शहरीकरण, पलायन, नए मतदाताओं की संख्या में वृद्धि, मृत्यु की सूचना न मिलने और अवैध प्रवासियों के नाम सूची में शामिल होने जैसे कारणों से यह पुनरीक्षण जरूरी है.

इसके लिए मतदाताओं को गणना प्रपत्र (Enumeration Forms – EF) भरना होगा, जिसमें नाम, पता, जन्मतिथि, आधार नंबर, और माता-पिता से संबंधित जानकारी देनी होगी. विशेष रूप से, 2003 की मतदाता सूची में नाम न होने वाले मतदाताओं को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने होंगे:

  • 1.       1 जुलाई 1987 से पहले जन्मे: जन्मतिथि या जन्म प्रमाणपत्र में से एक.
  • 2.       1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच जन्मे: जन्म दस्तावेज के साथ माता या पिता का जन्म प्रमाणपत्र.
  • 3.       2 दिसंबर 2004 के बाद जन्मे: जन्म दस्तावेज के साथ माता और पिता दोनों के जन्म प्रमाणपत्र.

विपक्ष का विरोध: ‘लोकतंत्र पर खतरा’

महागठबंधन (इंडिया गठबंधन) ने इस प्रक्रिया को बैक डोर एनआरसी करार देते हुए कड़ा विरोध जताया है. पटना में आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में राजद नेता तेजस्वी यादव, कांग्रेस के पवन खेड़ा, और भाकपा (माले) के दीपांकर भट्टाचार्य ने इसे ‘लोकतंत्र के लिए खतरनाक’ बताया. तेजस्वी यादव ने कहा, ‘बिहार में सबसे ज्यादा पलायन होता है. केंद्र सरकार के अनुसार, 3 करोड़ रजिस्टर्ड मजदूर बिहार से बाहर हैं, और गैर-रजिस्टर्ड को मिलाकर यह संख्या 4-5 करोड़ हो सकती है. क्या ये लोग वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने बिहार आएंगे?’

दीपांकर भट्टाचार्य ने सवाल उठाया कि जब असम में 3.25 करोड़ लोगों की एनआरसी प्रक्रिया में 6 साल लगे, तो बिहार में 3 महीने में 8 करोड़ मतदाताओं का सत्यापन कैसे संभव है? उन्होंने पूछा, ’22 साल बाद यह कदम अचानक क्यों उठाया गया, और इसकी शुरुआत बिहार से क्यों?’

कांग्रेस ने दावा किया कि तीन महीने पहले हुए समरी रिव्यू में इस विशेष पुनरीक्षण की कोई चर्चा नहीं हुई. पवन खेड़ा ने कहा, ‘चुनाव आयोग ने 4000 परामर्श सत्र आयोजित किए, लेकिन एक में भी इसकी बात नहीं उठी. राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श क्यों नहीं किया गया?’

पश्चिम बंगाल पर असर: ममता बनर्जी का आरोप

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस अभियान को ‘एनआरसी से भी खतरनाक’ करार दिया. उन्होंने दावा किया कि यह बिहार से शुरू होकर पश्चिम बंगाल के प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाएगा. ममता ने कहा, ‘चुनाव आयोग बिना राजनीतिक दलों से परामर्श के एकतरफा फैसला कैसे ले सकता है? यह लोकतांत्रिक ढांचे के खिलाफ है.’ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने इसे ‘चुनावी घोटाला’ करार देते हुए कहा कि बिहार में होने वाली इस प्रक्रिया का असर बंगाल पर भी पड़ेगा.

ADR की चिंता: ‘तकनीकी प्रक्रिया या साजिश?

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने कहा, ‘एक दिन के आदेश पर इतनी बड़ी तैयारी असंभव है. 8 करोड़ मतदाताओं का घर-घर सत्यापन, ड्राफ्ट रोल तैयार करना, और शिकायतों का निपटारा तीन महीने में असंभव है.’ उन्होंने आशंका जताई कि यह प्रक्रिया कई लोगों को मताधिकार से वंचित कर सकती है.

4.76 करोड़ वोटर खतरे में

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने दावा किया कि इस प्रक्रिया से 4.76 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाने का खतरा है, क्योंकि उनके पास जन्म प्रमाणपत्र, मैट्रिक प्रमाणपत्र, या जाति प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज नहीं हो सकते. उन्होंने इसे ‘लोकतंत्र को चुपके से नष्ट करने की कोशिश’ बताया.

सत्ताधारी दलों का पक्ष

सत्ताधारी गठबंधन (एनडीए) ने इस प्रक्रिया को पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने का कदम बताया. उनका कहना है कि यह अभियान पिछले चुनावों में मतदाता सूची में धांधली की शिकायतों को दूर करेगा.

आगे क्या?

विपक्ष ने इस प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की है और जल्द ही चुनाव आयोग से मुलाकात की योजना बना रहा है. तेजस्वी यादव ने कहा, “जिनके पास जरूरी दस्तावेज नहीं होंगे, उनका नाम कट सकता है. यह गरीबों और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की साजिश है.”

चुनाव आयोग ने भरोसा दिलाया है कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत पारदर्शी और समावेशी होगी. हालांकि, विपक्ष के सवालों और जनता की चिंताओं के बीच यह अभियान बिहार की सियासत में नया तूफान खड़ा कर रहा है.

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