नवादा (बिहार): कारगिल में ऑपरेशन रक्षक के दौरान शहीद हुए नवादा निवासी मनीष कुमार (27 वर्ष) का पार्थिव शरीर शनिवार को उनके पैतृक गांव पांडेय गंगौट लाया गया। वहां हजारों लोगों ने उन्हें अंतिम विदाई दी। पूरे गांव में गमगीन माहौल के बीच ‘भारत माता की जय’ के नारों के साथ उनका राजकीय सम्मान से अंतिम संस्कार हुआ।
14 मई को शहीद हुए मनीष की अंतिम यात्रा में गांव से लेकर प्रशासन तक हर किसी की आंखें नम थीं। लोगों ने कई किलोमीटर तक पैदल चलकर शहीद को कंधा दिया। फूलों की वर्षा और तिरंगे के साये में देश ने अपने वीर सपूत को श्रद्धांजलि दी।
“पति की शहादत बेकार नहीं जाने दूंगी”
मनीष कुमार की पत्नी खुशबू ने अपने आँसुओं के बीच अद्भुत साहस का परिचय दिया। शादी को महज दो महीने ही हुए थे, पर अब वे सेना में शामिल होकर देश की सेवा करना चाहती हैं। उन्होंने कहा,
“मनीष से मेरी आखिरी बात 13 मई को हुई थी। उन्होंने कहा था कि जल्दी लौटेंगे। मैं चाहती हूं कि उनकी शहादत बेकार न जाए।”
उनके इस साहसिक संकल्प ने हर किसी का दिल छू लिया और यह दिखा दिया कि शहीद सिर्फ मोर्चे पर ही नहीं, उनके परिवार में भी देशभक्ति जीवित रहती है।
ऑपरेशन रक्षक के दौरान आई तबीयत बिगड़ी
नवादा डीएम रवि प्रकाश ने बताया कि 14 मई की सुबह ड्यूटी के दौरान मनीष की अचानक तबीयत बिगड़ी और वे गिर गए। इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। 15 मई को सेना ने उन्हें शहीद का दर्जा देते हुए परिजनों को जानकारी दी।
पटना से नवादा तक पूरे मार्ग पर मनीष की अंतिम यात्रा में देशभक्ति की झलक साफ नजर आई। डिप्टी सीएम विजय सिन्हा, सांसद विवेक ठाकुर, और विधायक मोहम्मद कामरान ने भी पटना में उन्हें श्रद्धांजलि दी थी।
सेना सेवा का गौरवमयी परिवार
मनीष चार भाइयों में सबसे छोटे थे। उनके दो भाई पहले से ही भारतीय सेना में कार्यरत हैं—एक उत्तराखंड और दूसरा गया जिले में तैनात है। शहीद के पिता अशोक राम ने बताया कि उन्हें पहले सूचना मिली कि मनीष ड्यूटी के दौरान बेहोश हो गए, फिर इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
“मनीष बचपन से ही अनुशासित और देशभक्त थे। उन्हें सेना में जाना ही था। हमें गर्व है, लेकिन दुख असहनीय है,” – अशोक राम, शहीद के पिता।
गांव में उमड़ा जनसैलाब, नेताओं ने दी श्रद्धांजलि
शहीद मनीष के अंतिम संस्कार में नवादा विधायक विभा देवी, एमएलसी अशोक यादव, और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी सहित बड़ी संख्या में आम लोग उपस्थित रहे। गांव के छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने तिरंगे के नीचे वीर सपूत को अंतिम सलामी दी।






